Sunday, 27 December 2015

झाँसी की रानी

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। 

चमक उठी सन सत्तावन मेंवह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कानपूर के नाना कीमुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नामपिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वहनाना के सँग खेली थी,
बरछीढालकृपाणकटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़|

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
                                           Subhadrakumari Chauhan

Tuesday, 22 December 2015

Environmental Friendly Rituals in Indian Culture

A small overview


In India all types of functions start with lighting ceremony and remembrance of Almighty (Creater of universe) in terms of pooja (पूजा). The the pooja is organized to create environment of clean energy by burning many holy leaves and sticks with Ghee (from Indian cow only), which is generally called havan (हवन).

In Agriculture, ploughing with the help of ox avoids the use of petroleum.
For pests there has been a culture of organic pesticides if serious pest attack happens, otherwise there was a tradition of sowing more than one crop simultaneously. These crops provide the necessary elements to each other helping more growth and repelling insects i.e. insects harmful for one crop are repelled by other thereby reducing the expenditure of farmer.

In Indian continent, from many years emphases is given to such developmental works which do not violate nature and its laws. As per the very important rule of nature, "Change" and that also slow, is always taken care of from billions of years. This rule can be seen from cooking in the kitchen to working in the daily life.
Here, there are many trees which are treated as holy tree and are worshipped for many-many years. But now, as it has been known scientifically, that the tree like pipple, produces oxygen during nights also which in general does not happen in case of other plants and trees. This shows that the knowledge of nature and is rule were known to the people in the continent for many-many years.









Monday, 21 December 2015

Patriotic Song


              जागे मेरा देश महान्



जागे मेरा देश महान् जय भारत जय हिन्दोस्तान,

                                       जागे मेरा देश महान्।।ध्रु॰।।

बेदज्ञान का सूर्य उदय हो, पुन: धर्म का हो सम्मान

गौ पूजा , गायत्री का जप, गंगा गीता के गुणगान,

पुन: जन्म लें इस धरती पर, कर्मवीर ऋषि मुनि महान् ।।१।। 

ढूँढे से भी न दर्शन हों हैं दीन दुखी के यहाँ कभी,

अन्न, वस्त्र, गृह, आत्मज्ञान के भरे रहें भण्डार सभी। 

फले-फूलें फिर से जागती, भारत देश यह विश्व महान्।।२।।

भौतिक तम में भटक रहे, मानव को हम पुन: बचायें,

और पकड़ कर आत्मज्ञान के, राज मार्ग पर लायें। 

पुन: विश्व के प्राणीमात्र का अपने द्वारा हो कल्याण ।।३।। 

विश्व गुरु सिंहासन पर, फिर बैठे भारत माता,

दिखे पुन: संसार चरण में, माँ को शीष नवाता I

हिमगिरि के शिखरों पर फहरे, आर्य देश का अमर निशान ।।४।।

Friday, 18 December 2015

History of GEETA


The brief history of famous Hindu Holy Book, GEETA (गीता) (Full name Shreemadbhagwat Geeta (श्रीमदभगवत गीता) is:

The knowledge from Almighty to Bramah (ब्रम्हा).
Bramah (ब्रम्हा)preached to Vivswan  (विवस्वान).
Vivswan (विवस्वान) preached to Manu (मनु).
Manu (मनु)preached to Ekshvaku (इक्ष्वाकु)(Administrator of Earth).
Ekshvaku (इक्ष्वाकु)is the ancestor of Raghukul (रघुकुल)(In which family (कुल) Shree Ram Chandra was born.
The time of beginning of this holy knowledge starts from the beginning of 2nd period (युग) i.e. treta yug (त्रेता युग):
1. Satyug (सतयुग)
2. Treta yug (त्रेता युग) (Age of period 12,00,000 years)
3. Dwapar yug (द्वापर युग) (Age of period 8,00,000 years)
4. Kal yug(कल युग) (Age of period 4,32,000 years) 5,000 years have been passed.
This means Manu taught to his student (शिष्य) Ekshvaku the knowledge of Geeta about 20,05,000 years ago.



Friday, 24 April 2015

Climate Change



Global warming a concern for all
Fear of calamity always sprawl

Depleting forests lead to no rain
Creature life becoming full of pain

Seasons forced to enter without time
Temperature going up with every sunshine

Expansion of technology is only vision
Increased harmful gases are affecting season

Squeezed glaciers going down
Vigorous floods wash away town

Summer are hot and winter are cold
Monsoon rain is out of hold

Spring is early or sometimes late
Autumn has no fixed date

Time is now to take steps serious
Before the nature becomes furious

Thursday, 16 April 2015

st. Kabir Says (कबीर के दोहे)


In Indian Culture (Hindu Culture) the Guru (Teacher) is always believed to be supreme. Because he/she is the only being who can lead human to the destination one desires. Saint Kabir has clearly mentioned in his words as:

कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और ।
हरी रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥ 

अनुवाद: वे लोग वास्तव में अंधे हैं जो गुरु को परमात्मा से अलग समझते हैं अर्थात गुरु और परमात्मा एक ही हैं बल्कि गुरु परमात्मा से भी बढ़ कर है । क्योंकि यदि परमात्मा नाराज़ हो जाए तो हमें गुरु बचा लेते हैं परन्तु यदि गुरु नाराज़ हो जाए तो हमें कोई नहीं बचाएगा ।

The people who believe the Guru to be separate from God are ignorant. Although both are one entity but Guru may be treated more important than God. This is because the God can be achieved by the grace of Guru only. If Guru does not help the God cannot be achieved. 

Saturday, 11 April 2015

Save Forest


No one cares my silent warn
Human is busy on concrete charm
Plant a tree make two aware
To increase the forest layer.

No attention my admonish on
Imagine life with my frown upon  
Come forward with dare
To increase the forest layer.

Inevitable disaster is very near
if thought is not put an gear
Pledge a sapling and its care
To increase the forest layer.

Catastrophe is Destination
Save trees for protection
Analyse technology with care
To increase the forest layer.

Helpless will I be to save
In case it is too late
Save nature and promise its care
To increase the forest layer.

Greed and grab are big reasons
Earth faces change in seasons
Use more eco-friendly with dare
To increase the forest layer.

Get along and make a sphere
Of green land and water clear
Help to flourish extinct and rare
To increase the forest layer.

Friday, 10 April 2015

बचपन

वो दिन कितने अच्छे थे । जब हम छोटे बच्चे थे ।। 
मस्ती में खेलना, निडर घूमना। मन के हम कच्चे थे ।

वो दिन कितने अच्छे थे । जब हम छोटे बच्चे थे ।।
दिन गुजरे कुछ इस तरह, सूरज डूबा जिस तरह । हम अभी मन के कच्चे थे ।

वो दिन कितने अच्छे थे । जब हम छोटे बच्चे थे ।।
बच्पन गया जवानी आई, साथ में सामाजिक बेड़ियाँ लाई । मन के हम अभी तक कच्चे थे ।

वो दिन कितने अच्छे थे । जब हम छोटे बच्चे थे ।।
समाज और ज़िमेदारी का ये कैसा मेल । टूट गई बच्पन की वो रेल । अब नहीं हम बच्चे थे ।

वो दिन कितने अच्छे थे । जब हम छोटे बच्चे थे ।।
वो दिन आ नहीं सकते चाहे कर दो कुछ भी सेल ।

बच न पाता कोई यहाँ, प्रकृति का ये कैसा खेल । हम जब मासूम और सच्चे थे ।

वो दिन कितने अच्छे थे । जब हम छोटे बच्चे थे ।
शिकवा करें किस से इस नियम कठोर का ।

छोड़ी हुई मंज़िल को जोड़ता नहीं सिरा किसी डोर का । हम जब सबके अच्छे थे ।  

वो दिन कितने अच्छे थे । जब हम छोटे बच्चे थे ।
वो दिन कितने अच्छे थे । जब हम छोटे बच्चे थे ।।

हमारा गौरव: भारतीय संस्कृति

हमारी धरोहर हमारी संस्कृति कितनी है महान 
जो करती है भाईचारे और विश्वशान्ति का गुणगान 
मिल कर चलना मेहनत करना यही हम सबकी है पहचान।

हज़ारों वर्षों की परंपरा धरती पर है स्वर्ग समान
दुनिया पढ़कर इतिहास इसका हो जाती है हैरान
मिल कर चलना मेहनत करना यही हम सबकी है पहचान।

तोड़-मरोड़ और लूट की मुगलों ने 
लेकिन फिर भी मिटा न पाये भारत की शान
मिल कर चलना मेहनत करना यही हम सबकी है पहचान।

गुरुकुल प्रणाली और खेती नष्ट की अंग्रेजों ने
सोने की चिड़िया कहलाता था भारत  महान
मिल कर चलना मेहनत करना यही हम सबकी है पहचान।

पाश्चात्य के प्रभाव से निकलना है बहार 
ग्रामीण हो या शहरी या फिर हो नौ जवान
मिल कर चलना मेहनत करना यही हम सबकी है पहचान।

विरासत को वापिस हमें मिलकर है संजोना
बुलंद इरादों और आशीष का धरती को है वरदान
मिल कर चलना मेहनत करना यही हम सबकी है पहचान।

बुलन्दी की राह पर न डगमगाएँ कदम हमारे
जब तक ज़िंदा न हो भारत की वह पहचान   
मिल कर चलना मेहनत करना यही हम सबकी है पहचान।